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दुर्गराज चित्तौड़। किलों में किला और गढ़ों में गढ़। कहावत भी है
कि गढ़ तो चित्तौड़ और सब गढ़इयां...। मेवाड़ की राजधानी, जिसे शिवपुराण आदि में चित्रकूट कहा गया है। इस चित्तौड़ के नाम
से एक तिथि का नामकरण हुआ है। यह है-- चित्तौड़ी आठम।* यह नामकरण क्यों और कैसे
हुआ ? तीन-चार दिनों तक लगातार शोध-विचार, संदर्भ-स्रोतों के अवगाहन के
बावजूद मैं किसी निर्णय पर नहीं पहुंच पाया, मगर रोचक बात है कि इस किले के
नाम पर एक तिथि की पहचान बनी हुई है और इसको मनाया जाता है।
वैशाख के शुक्ल की 8 का नामकरण चित्तौड़ के नाम पर हुआ है।
वैशाख के शुक्ल की 8 का नामकरण चित्तौड़ के नाम पर हुआ है।
क्या इस दिन चित्तौड़ के किले की स्थापना हुई या चित्रकूट नगर
का निवेश हुआ ? यहां के किसी प्राचीन अभिलेख में इस तिथ्ाि का जिक्र नहीं।
राजधानी रहने तक यहां के महाराणा उदयसिंह के शासनकाल तक ताे कहीं इस तिथि का जिक्र
नहीं है। वैसे मेवाड़ में किसी गांव या बस्ती की स्थापना का स्मरण दो आधार पर
रखा जाता है कि जब गांव में किसी भी उत्सव पर पहला ढोल बजाया जाए तो वह वहां की 'खेड़ाखूंट' माता के आगे बजता है और तीर्थाटन पर जाकर आएं तो शीशनमन वहां की
पथवारी पर होता है। कहीं-कहीं भैरव के प्रति भी यह सम्मानभाव बौद्धकाल के
यक्षपूजन की तरह बरकरार है, मगर, यहां तिथियां प्रमुख नहीं है।
महाराणा कुंभा के काल में तो मेवाड़ और गुजरात तक मान्य तिथियों
की परंपरा पर बहुत कुछ लिखा गया। तिथि सम्मत कार्यों को भी एक-एक करके गिनाया
गया। यही मान्यता बाद में भी मेवाड़ में बनी रहीं। यही नहीं, उस काल में चित्तौड़ीगज, चितौड़ीहाथ, चित्तौड़ी बाव,
चित्तौड़ी सिक्का, चित्तौड़ी टांकी आदि की ख्याति भी रही। चित्तौड़ी ख्यालों का
तो जवाब ही नहीं। महाराणा कुंभा ने मेवाड़ी नाटकों की रचनाकर संस्कृत नाटकों की
बजाय लोकभाषा में नाटकों के मंचन की एक मजबूत और अद्वितीय पहल की थी। तब 'चित्तौड़ी खेल'
और उसके अभिनेता, चित्तौड़ी चितारा, चित्तौड़ी सूत्रधार, चित्तौडी कारीगर,
चितौड़ी पत्थर और न जाने क्या
क्या....। वास्तुशास्त्र मेें तो एक हजार साल से 'चित्रकूट शैली'
के मंदिर ही ख्याति लब्ध रहे
हैं।
मगर, चित्तौड़ी आठम... लगता यही है कि जिस चित्तौड़ ने इतनी चीजों की
साख दी, उसी जमीं ने एक तिथि को भी पहचान दी। एक ऐसी तिथि जिसका देवता ज्योतिष
में विगत डेढ हजार सालों से शिव को माना गया है और शिव ही मेवाड़ के शासक रहे हैं।
एकलिंगजी का पाटोत्सव भी तो वैशाख में ही मनाया जाता रहा है। मगर, इस पर और विचार करना अभी बाकी है। कुछ आप भी बताएं...।
(* प्रियवर श्री
राकेश पटवारी अौर श्री राजनारायण शर्मा का आभार कि मुझे इस संबंध में प्रेरित कर
गए। इस उत्सव के अवसर पर मेरी जन्मभूमि चित्तौड़वासियों को बधाई और शुभकामनाएं, याद आ रही है गाइड फिल्म और उसका गीत.. अपने ही बस में नहीं मैं, दिल है कहीं हूं कहीं मैं...)
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चिŸाौड़गढ़ नगर से 40 किमी. पश्चिम में ’कपासन’ नगर इसी नाम के उपखण्ड़, तहसील तथा पंचायत समिति का मुख्यालय है। यह नगर 24°53‘ उत्तरी अक्षांश व 74°19‘ पूर्वी देशांतर पर स्थित है और चिŸाौड़गढ़-उदयपुर स्टेट हाइवे नम्बर 9 पर है।
कभी यह नगर कपासन का एक समृद्ध व्यापारिक केन्द्र हुआ करता था। कहते हैं कि कपास और सण का उत्पादन एवं व्यवसाय यहां अधिक होने से ही इस नगर का नाम कपासन पड़ा। कपासन में एक पुराना गढ़ भी है जिसमें अब स्कूल चलता है। शहर से रेल्वे स्टेशन मार्ग पर करीब डेढ़ किमी. दूर प्रख्यात सूफी संत हजरत दिवाने शाह की दरगाह कपासन की प्रमुख पहचान है। कोई कपासन आए, और बाबा दीवाना शाह की दरगाह पर न जाए, ऐसा हो ही नहीं सकता। दरगाह के बुलंद दरवाजे की गगनचुंबी मीनारें दूर से ही दिखाई देती हैं। बुलंद दरवाजे की भव्यता ऐसी कि देखने वाला देखता ही रह जाए। बाबा दीवाना शाह की यह दरगाह हिन्दु-मुस्लिम को एक सूत्र में बांधती हुई कौमी एकता एवंं भाईचारे की मिसाल कायम करती है। लगभग 30 बीघा क्षेत्र में बनी इस दरगाह परिसर में कुआं, नलकूप, बगीचा व मस्जिद के अतिरिक्त करीब 50 कमरे बने हुए हैं। उर्स के दौरान यहां आने वाले जायरीनों को निःशुल्क आवास, पानी, रोशनी आदि की सुविधा प्रदान की जाती है। दरगाह प्रांगण में विशाल महफिल खाना बना हुआ है। बाबा दीवाना शाह का असली नाम अब्दुल रज्जाक था। लोग प्रेम से इन्हें कालू कहकर भी पुकारते थे। गुजरात के डीसा छावनी पालनपुर स्टेट के राजपुरा गांव में अब्दुल कादर साब के घर में जन्मा यह बालक पढ़ना-लिखना छोड़कर कुदरत के करिश्मों पर चिंतन करने लगा। दुनिया में कौन किसका साथी है, धरती ने जिसको जन्म दिया वह उसे एक दिन अपने पेट में समा लेगी। इस तरह के विचारों से प्रभावित हो अपने वतन डीसा को अंतिम प्रणाम करके यह डीसा से शिवगंज होते हुए अजमेर शरीफ पहुंचे लेकिन मन में शांति नहीं मिलने से अजमेर से सोजत रोड़ चले गए। कुछ दिनों इधर-उधर भ्रमण करने के बाद देवगढ़ (मदारिया) चले गये। उन दिनों देवगढ़ में बहुत बड़े साधक संत कुतुब अली शाह बिराजते थे। कुछ समय तक वे वहां ठहरे। कुतुब अली शाह पहुंचे हुए संत थे जिनके उपदेशों से इनके बैचेन मन को शांति मिली और दीवाना शाह ने कुतुब अली शाह को अपना गुरू बना लिया।
देवगढ़ से केलवा, राजनगर, कुरज आदि स्थानों पर भ्रमण करने के बाद वे नसीरबद पहुंचे, जहां आपके गुरू ने दीक्षा प्रदान कर विलायत अली शाह नाम रखा। दीवाना शाह नाम मात्र संबोधन के लिये था। बाबा दीवाना शाह अनेक स्थानों का भ्रमण करते हुए कपासन पहुंचे और भक्ति, साधना के कार्यों में जुट गये। कस्बे के मोमिन मोहल्ले में अपना पड़ाव ड़ाला। गांव के कई लोग संपर्क में आने लगे। बाबा के अद्भुत चमत्कारों की चर्चा तेजी से फैलने लगी। धीरे-धीरे अनेक हिन्दु और मुसलमान इनके शिष्य बन गये जिनमें मास्टर हरिराम कुमावत प्रमुख थे। रोगियों, दुखियोें और असहायों की भीड़ बाबा के यहां सदा लगी रहती थी और लोगों की संत के प्रति श्रद्धा बढ़ने लगी। मेवाड़ के लोकप्रिय महाराणा भूपाल सिंह जी ने अपने कपासन के हाकिम लाला प्यारेलाल से कहा ’’मैं साधक बाबा सूफी संत बाबा दीवाना शाह के दर्शन करना चाहता हूं।’’ बाबा को महाराणा का संदेश पहुंचाया गयां उदयपुर के जगनिवास में महाराणा और दीवाना शाह का मिलना हुआ। महाराणा ने बाबा को नजरना दिया। बाबा दीवाना शाह (किबला विलायत अली शाह) को मेवाड़ के महाराणा ने तीस बीघा जमीन दी जो कपासन रेल्वे स्टेशन के पास स्थित है। हिजरी सन् 1363 (सन् 1944) में माह सफर 8 तारीख जुम्मेरात की ढ़लती रात में बाबा दीवाना शाह ने पर्दा लिया। बाबा के निधन का समाचार क्षेत्र में हवा की तरह फैल गया। हजारों की संख्या में हिन्दु और मुसलमान बाबा की शव यात्रा में शरीक हुए। बाबा को महाराणा द्वारा दी गई जमीन पर दफना दिया गया। कपासन कस्बा आज बाबा दीवाना शाह की साधना स्थली के रूप में देश के कोने-कोने में जाना जाता है। बाबा के विश्वास पात्र शिष्यों ने मिलकर यहां मजार पर सुंदर मकबरा बना दिया जिसके निर्माण में हिन्दुओं और मुसलमानों ने दिल खोल कर धन दिया। धीरे-धीरे यह मजार एक दरगाह के रूप बदल गई। कपासन कस्बे और रेल्वे स्टेशन के बीच बनी यह दरगाह दूर से ही दिखाई देती है। बाबा के पाटवी शिष्य हरिराम कुमावत व उनके साथियों नें विशाल दरगाह का निर्माण जन सहयोग से करवा कर इस पावन स्थान को हिन्दु-मुस्लिम एकता का संगम बना दिया।
कपासन में हर वर्ष सफर माह की 8 तारीख को हजरत दीवाना शाह रहमतुल्लाह अलैह वसल्लम का सालाना उर्स भरता है। उर्स का निशान अलम (झण्ड़ा) दीवाना शाह के मौमिन मोहल्ला स्थित मकान से बैण्ड़-बाजों के साथ लाया जाता है। अलम को दरगाह के बुलंद दरवाजे पर लगा कर एवं मजारे खास पर चादर चढ़ा कर उर्स का विधिवत् ऐलान किया जाता है। उर्स के विशेष आकर्षणों में अलम, कव्वालियों, लंगर, गुस्ल, कुल की फातिहा एवं रंग के साथ कुल के छींटे अपनी एक अलग ही मिसाल रखते हैं। दरगाह में स्थित विशाल डेग भी उर्स के दौरान पकाई जाती है। बाबा दीवाना शाह के सालाना उर्स में राजस्थान, मध्यप्रदेश, उŸारप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र के अलावा पाकिस्तान से भी जायरीन आकर जियारत करते हैं। समय प्रातः 5.30 से 11.00 बजे तक, मध्यान्ह 2 बजे से 3.30 बजे तक तथा अपरान्ह 4 बजे से रात्रि 8.30 बजे तक।
कपासन बस स्टैण्ड़ पर ही नगरपालिका भवन है। बस स्टैण्ड़ पर राम स्नेही सम्प्रदाय का रामद्वारा बना हुआ है तथा घास चबूतरे पर संतोषी माता का मंदिर है। बस स्टैण्ड़ के निकट पंचमुखी बालाजी का मंदिर, शहर के भीतर चारभुजा नाथ का मंदिर, कल्याण राय जी का भव्य प्राचीन मंदिर है। इसके अलावा भंड़ारियों की हवेली, जो कभी मेवाड़ के योद्धाओं का आवास-स्थल था, राज राजेश्वर सागर तालाब व छतरियां, भैरवगढ़, सोमानिया बाग में सोमेश्वर महादेव का मंदिर व बावड़ी, खारी बावड़ी, कलिंदरी मस्जिद तथा इतिहास प्रसिद्ध जोधा व चूण्ड़ा की लड़ाई में मारे गये वीरों की याद में बनाई गई पंच देवरियां, वीरों की छतरियां आदि हैं। कपासन नगर में मनोरंजन एवं भ्रमण के लिये स्टेशन रोड़ पर सार्वजनिक उद्यान है जिसमें नेहरू बालोद्यान वाले हिस्से में बच्चों के झूले व चकरी आदि लगे हैं। गुलाब सागर जलाशय की पाल पर मेवाड़ राज्य के समय गुलाब बाग था जहां आज नगरपालिका का कार्यालय भवन है। यहीं पर बस स्टैण्ड़ है। पुरानी कचहरी के मुख्य द्वार के दक्षिण में एक भूखण्ड़ पर भी मेवाड़ स्टेट के समय उद्यान था जो कचहरी उद्यान कहलाता है। नगर के उŸार में राज राजेश्वर जलाशय (बड़ा तालाब) की चादर के पास मुक्ति घाट पर प्राचीन छतरी उद्यान है। राजेश्वर जलाशय के किनारे गोपालजी का मंदिर, नगर में नरसिंहद्वारा व रघुनाथद्वारा भी है। कपासन में सीताफल खूब होते हैं। कपासन, चिŸाौड़गढ़-उदयपुर सड़क एवं रेल मार्ग पर स्थित होने के कारण यहां आवागमन की अच्छी सुविधा उपलब्ध है। यहां सार्वजनिक निर्माण विभाग का विश्रांति गृह बना हुआ है। दरगाह स्थल पर सरायें बनी हुई हैं।
कपासन में हजरत दीवानाशाह के सालाना उर्स के अलावा विजया दशमी पर रावण दहन का आयोजन होता और दशहरा मेला लगता है। नवरात्रि में चारभुजा मंदिर, कल्याणजी का मंदिर व हनुमानजी के मंदिर में कलात्मक झांकियां लगाई जाती हैं। भादवा मास में जलझूलनी एकादशी का मेला लगता है।
कभी यह नगर कपासन का एक समृद्ध व्यापारिक केन्द्र हुआ करता था। कहते हैं कि कपास और सण का उत्पादन एवं व्यवसाय यहां अधिक होने से ही इस नगर का नाम कपासन पड़ा। कपासन में एक पुराना गढ़ भी है जिसमें अब स्कूल चलता है। शहर से रेल्वे स्टेशन मार्ग पर करीब डेढ़ किमी. दूर प्रख्यात सूफी संत हजरत दिवाने शाह की दरगाह कपासन की प्रमुख पहचान है। कोई कपासन आए, और बाबा दीवाना शाह की दरगाह पर न जाए, ऐसा हो ही नहीं सकता। दरगाह के बुलंद दरवाजे की गगनचुंबी मीनारें दूर से ही दिखाई देती हैं। बुलंद दरवाजे की भव्यता ऐसी कि देखने वाला देखता ही रह जाए। बाबा दीवाना शाह की यह दरगाह हिन्दु-मुस्लिम को एक सूत्र में बांधती हुई कौमी एकता एवंं भाईचारे की मिसाल कायम करती है। लगभग 30 बीघा क्षेत्र में बनी इस दरगाह परिसर में कुआं, नलकूप, बगीचा व मस्जिद के अतिरिक्त करीब 50 कमरे बने हुए हैं। उर्स के दौरान यहां आने वाले जायरीनों को निःशुल्क आवास, पानी, रोशनी आदि की सुविधा प्रदान की जाती है। दरगाह प्रांगण में विशाल महफिल खाना बना हुआ है। बाबा दीवाना शाह का असली नाम अब्दुल रज्जाक था। लोग प्रेम से इन्हें कालू कहकर भी पुकारते थे। गुजरात के डीसा छावनी पालनपुर स्टेट के राजपुरा गांव में अब्दुल कादर साब के घर में जन्मा यह बालक पढ़ना-लिखना छोड़कर कुदरत के करिश्मों पर चिंतन करने लगा। दुनिया में कौन किसका साथी है, धरती ने जिसको जन्म दिया वह उसे एक दिन अपने पेट में समा लेगी। इस तरह के विचारों से प्रभावित हो अपने वतन डीसा को अंतिम प्रणाम करके यह डीसा से शिवगंज होते हुए अजमेर शरीफ पहुंचे लेकिन मन में शांति नहीं मिलने से अजमेर से सोजत रोड़ चले गए। कुछ दिनों इधर-उधर भ्रमण करने के बाद देवगढ़ (मदारिया) चले गये। उन दिनों देवगढ़ में बहुत बड़े साधक संत कुतुब अली शाह बिराजते थे। कुछ समय तक वे वहां ठहरे। कुतुब अली शाह पहुंचे हुए संत थे जिनके उपदेशों से इनके बैचेन मन को शांति मिली और दीवाना शाह ने कुतुब अली शाह को अपना गुरू बना लिया।
देवगढ़ से केलवा, राजनगर, कुरज आदि स्थानों पर भ्रमण करने के बाद वे नसीरबद पहुंचे, जहां आपके गुरू ने दीक्षा प्रदान कर विलायत अली शाह नाम रखा। दीवाना शाह नाम मात्र संबोधन के लिये था। बाबा दीवाना शाह अनेक स्थानों का भ्रमण करते हुए कपासन पहुंचे और भक्ति, साधना के कार्यों में जुट गये। कस्बे के मोमिन मोहल्ले में अपना पड़ाव ड़ाला। गांव के कई लोग संपर्क में आने लगे। बाबा के अद्भुत चमत्कारों की चर्चा तेजी से फैलने लगी। धीरे-धीरे अनेक हिन्दु और मुसलमान इनके शिष्य बन गये जिनमें मास्टर हरिराम कुमावत प्रमुख थे। रोगियों, दुखियोें और असहायों की भीड़ बाबा के यहां सदा लगी रहती थी और लोगों की संत के प्रति श्रद्धा बढ़ने लगी। मेवाड़ के लोकप्रिय महाराणा भूपाल सिंह जी ने अपने कपासन के हाकिम लाला प्यारेलाल से कहा ’’मैं साधक बाबा सूफी संत बाबा दीवाना शाह के दर्शन करना चाहता हूं।’’ बाबा को महाराणा का संदेश पहुंचाया गयां उदयपुर के जगनिवास में महाराणा और दीवाना शाह का मिलना हुआ। महाराणा ने बाबा को नजरना दिया। बाबा दीवाना शाह (किबला विलायत अली शाह) को मेवाड़ के महाराणा ने तीस बीघा जमीन दी जो कपासन रेल्वे स्टेशन के पास स्थित है। हिजरी सन् 1363 (सन् 1944) में माह सफर 8 तारीख जुम्मेरात की ढ़लती रात में बाबा दीवाना शाह ने पर्दा लिया। बाबा के निधन का समाचार क्षेत्र में हवा की तरह फैल गया। हजारों की संख्या में हिन्दु और मुसलमान बाबा की शव यात्रा में शरीक हुए। बाबा को महाराणा द्वारा दी गई जमीन पर दफना दिया गया। कपासन कस्बा आज बाबा दीवाना शाह की साधना स्थली के रूप में देश के कोने-कोने में जाना जाता है। बाबा के विश्वास पात्र शिष्यों ने मिलकर यहां मजार पर सुंदर मकबरा बना दिया जिसके निर्माण में हिन्दुओं और मुसलमानों ने दिल खोल कर धन दिया। धीरे-धीरे यह मजार एक दरगाह के रूप बदल गई। कपासन कस्बे और रेल्वे स्टेशन के बीच बनी यह दरगाह दूर से ही दिखाई देती है। बाबा के पाटवी शिष्य हरिराम कुमावत व उनके साथियों नें विशाल दरगाह का निर्माण जन सहयोग से करवा कर इस पावन स्थान को हिन्दु-मुस्लिम एकता का संगम बना दिया।
कपासन में हर वर्ष सफर माह की 8 तारीख को हजरत दीवाना शाह रहमतुल्लाह अलैह वसल्लम का सालाना उर्स भरता है। उर्स का निशान अलम (झण्ड़ा) दीवाना शाह के मौमिन मोहल्ला स्थित मकान से बैण्ड़-बाजों के साथ लाया जाता है। अलम को दरगाह के बुलंद दरवाजे पर लगा कर एवं मजारे खास पर चादर चढ़ा कर उर्स का विधिवत् ऐलान किया जाता है। उर्स के विशेष आकर्षणों में अलम, कव्वालियों, लंगर, गुस्ल, कुल की फातिहा एवं रंग के साथ कुल के छींटे अपनी एक अलग ही मिसाल रखते हैं। दरगाह में स्थित विशाल डेग भी उर्स के दौरान पकाई जाती है। बाबा दीवाना शाह के सालाना उर्स में राजस्थान, मध्यप्रदेश, उŸारप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र के अलावा पाकिस्तान से भी जायरीन आकर जियारत करते हैं। समय प्रातः 5.30 से 11.00 बजे तक, मध्यान्ह 2 बजे से 3.30 बजे तक तथा अपरान्ह 4 बजे से रात्रि 8.30 बजे तक।
कपासन बस स्टैण्ड़ पर ही नगरपालिका भवन है। बस स्टैण्ड़ पर राम स्नेही सम्प्रदाय का रामद्वारा बना हुआ है तथा घास चबूतरे पर संतोषी माता का मंदिर है। बस स्टैण्ड़ के निकट पंचमुखी बालाजी का मंदिर, शहर के भीतर चारभुजा नाथ का मंदिर, कल्याण राय जी का भव्य प्राचीन मंदिर है। इसके अलावा भंड़ारियों की हवेली, जो कभी मेवाड़ के योद्धाओं का आवास-स्थल था, राज राजेश्वर सागर तालाब व छतरियां, भैरवगढ़, सोमानिया बाग में सोमेश्वर महादेव का मंदिर व बावड़ी, खारी बावड़ी, कलिंदरी मस्जिद तथा इतिहास प्रसिद्ध जोधा व चूण्ड़ा की लड़ाई में मारे गये वीरों की याद में बनाई गई पंच देवरियां, वीरों की छतरियां आदि हैं। कपासन नगर में मनोरंजन एवं भ्रमण के लिये स्टेशन रोड़ पर सार्वजनिक उद्यान है जिसमें नेहरू बालोद्यान वाले हिस्से में बच्चों के झूले व चकरी आदि लगे हैं। गुलाब सागर जलाशय की पाल पर मेवाड़ राज्य के समय गुलाब बाग था जहां आज नगरपालिका का कार्यालय भवन है। यहीं पर बस स्टैण्ड़ है। पुरानी कचहरी के मुख्य द्वार के दक्षिण में एक भूखण्ड़ पर भी मेवाड़ स्टेट के समय उद्यान था जो कचहरी उद्यान कहलाता है। नगर के उŸार में राज राजेश्वर जलाशय (बड़ा तालाब) की चादर के पास मुक्ति घाट पर प्राचीन छतरी उद्यान है। राजेश्वर जलाशय के किनारे गोपालजी का मंदिर, नगर में नरसिंहद्वारा व रघुनाथद्वारा भी है। कपासन में सीताफल खूब होते हैं। कपासन, चिŸाौड़गढ़-उदयपुर सड़क एवं रेल मार्ग पर स्थित होने के कारण यहां आवागमन की अच्छी सुविधा उपलब्ध है। यहां सार्वजनिक निर्माण विभाग का विश्रांति गृह बना हुआ है। दरगाह स्थल पर सरायें बनी हुई हैं।
कपासन में हजरत दीवानाशाह के सालाना उर्स के अलावा विजया दशमी पर रावण दहन का आयोजन होता और दशहरा मेला लगता है। नवरात्रि में चारभुजा मंदिर, कल्याणजी का मंदिर व हनुमानजी के मंदिर में कलात्मक झांकियां लगाई जाती हैं। भादवा मास में जलझूलनी एकादशी का मेला लगता है।
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