Saturday, 11 August 2012

आज केवल सूचनाओं का अम्बार लगा देना ही मीडिया का सरोकार नहीं रह गया है

नटवर त्रिपाठी जी 
राजस्थान श्रमजीवी पत्रकार संघ के तत्वावधान में पिछले सालों में को देखे तो ये तीसरी बार चित्तौड़गढ़ जैसे मझोले शहर में अनिल सक्सेना के समन्वयन में  राज्यस्तरीय कार्यशाला आयोजित हुई है.कार्यशाला पूरे रूप में नगर की पद्मिनी होटल में चार सितम्बर,2011 प्रमुख निर्णयों को समेटते हुए गहरे विचार-विमर्श के साथ पूरी हुई.ये आयोजन यहाँ मेवाड़ मीडिया वेलफेयर यूनियन के साथ जोड़कर हुआ जिसे उपस्थित प्रतिभागियों ने सराहा.आयोजन में दोपहर बारह बजे से ही आरम्भ हुए विमर्श में बहुतेरे वक्ताओं ने कभी सत्ता,प्रशासन को आड़े हाथों लिया तो कभी खुद मीडिया जगत में ही फ़ैल रहे भ्रष्टाचार को निशाना बनाया.ये कार्यशाला कहीं कहीं स्थानीय मेहनती पत्रकारों को देश दुनिया के मीडिया जगत को जानने के साथ ही कई ज़रूरी और अछूते मुद्दों पर सोचने को प्रेरित कर गयी.

आयोजन में पत्रकारों की रोजी-रोटी के साथ ही उनकी सुरक्षा और मूलभूत आवश्यकताओं को लेकर भी मांगें पूरजोर तरीके से रखी गयी,जिन्हें मंच ने बहुत सोच के साथ साथ अपने उदबोधन में शामिल किया है.मंच पर  जहां समाज के हर वर्ग से प्रतिनिधि मौजूद थे ने कार्यशाला को एक रूप में सम्पूर्ण आकार देदिया.सामाजिक परिदृश्य से जुडी एक ग़ज़ल और फिर माँ भारती पर केन्द्रित  एक ग़ज़ल के साथ ही मेवाड़ मीडिया वेलफेयर यूनियन  की संभागीय सचिव और कुशल सूत्रधार शकुन्तला सरूपरिया ने कार्यशाला को आगाज़ दिया जिसे निम्न वक्ताओं ने अपने अनुभव और वाणी से उत्तरोत्तर गाढा किया.


आज केवल सूचनाओं का अम्बार लगा देना ही मीडिया का सरोकार नहीं रह गया है.क्योंकि कई बार ये सूचनाएं समुदाय की ज़रूरतें पूरी नहीं करती.ऐसे में कई बार अनुत्तरित प्रश्न पीछे छूट जाते हैं.कम्प्यूटर और विज्ञान की इस क्रान्ति के बाद से ये देखा गया है कहीं कहीं हमारी अपनी भारतीयता ख़त्म हो गयी है.गौरतलब बात ये है कि बच्चों के लिए स्कूल से ज्यादा समय ये टी.वी. खा जाती है.इन हालातों में मीडिया का रोल बढ़ जाता है.शहरों में अनवरत मिल रही सुविधाओं को गाँव तक ले जाने में मीडिया की अहम् भूमिका हो सकती है. एक और ज़रूरी बात कि आजकल सभी तरफ हम मूल्यों में गिरावट और संक्रमण की बात करते नज़र आते हैं मगर उनका असल मूल्यांकन कोई नहीं करता.
  
मुझे ये भी लगता है कि बड़े अखबारों के साथ ही छोटे अखबारों में सम्पादकीय जैसा कुछ छपना चाहिए.इस पूरे मामले में प्रेस काउन्सिल को भी कड़े क़ानून बनाने की ज़रूरत है.कितनी अजीब बात है कि आजकल सभी बड़े मीडिया हाउस कोर्पोरेट जगत की तर्ज़ पर चल रहे हैं.उनके लक्ष्य भी कुछ बदले बदले हैं.बड़ी चिंता की बात ये भी है कि अधिकाँश पत्रकार आज भी मेहनत करने के बजाय सरकारी या सामाजिक संस्थाओं के प्रेस नोट के भरोसे अपनी खबरें छापते हैं.और इसी में अपने कर्तव्य की इतिश्री समझते प्रतीत होते हैं.जिला कलेक्टर रवि जैन ने भी अपनी बात में कहा कि इन बीते सालों में पत्रकारिता बहुत प्रखर होकर निखरी है.आज पत्रकार प्रशासन से भी दो कदम आगे जाकर काम कर रहा है.लेकिन कई बार इस व्यवसाय में पावर और पैसे की भूख आदमी को ब्लेकमेलिंग के धंधे में जा बिठाती है.आपाधापी के इस युग में भी अधिकाँश पत्रकार साथी पूरी ईमानदारी से अपने काम में लगे हुए हैं,वे बधाई के पात्र हैं.

बूंदी राजस्थान के जिला प्रमुख राजेश गोयल ने बताया कि ये वही चौथा स्तंभ है जिसके बूते सरकारें तक आती-जाती हुए दिखती है.जो मीडियाकर्मी यदि न्यायसंगत बात को असल रूप में समाज के सामने रखने की जोखिम उठाता है तो उसे महफूज़ रखने का दायित्व भी समाज का ही होना चाहिए.दैनिक और ज़रूरी आवश्यकताओं के पूरने के बाद ही मीडिया साथी भली प्रकार से अपना दायित्व निभा सकेगा ये बात हमें भूलनी नहीं चाहिए.

प्रदेशाध्यक्ष ईशमधु तलवार ने श्रमजीवी पत्रकार संघ की कार्यशालाएं प्रत्येक जिले में आयोजित करने का वादा करने के साथ ही कहा कि आज सभी तरफ बाजारवाद का प्रभाव है जहां उस्ताद फहीमुद्दीन डागर और उस्ताद असद अली खाद और रुकमा देवी मांगनियार जैसे कलाकारों के नहीं रहने की खबर तक नहीं बनती यहाँ जो बिकता है वही दिखता है

भाजपा जिलाध्यक्ष -सी.पी.जोशी के अनुसार व्यवस्था से जनता का विश्वास लगभग उठ गया है.आना हजारे के आन्दोलन में मीडिया के रोल से देश में एक ईमानदार माहौल बना है.पत्रकार जैसा प्राणी पूरे समय समाज के हित लगा रहता है.तो उसके हिस्से की चिंता भी समाज की अपनी चिंता होनी चाहिए.नगर पालिका उपाध्यक्ष और एस.बी.एन. चैनल निदेशक संदीप शर्मा के बयान की माने तो विश्व की सबसे बड़ी संसद भारतीय लोकतंत्र में आज जनता का सर्वाधिक विश्वास मीडिया में है.ओग अखबारों की बात लेते हैं .इसकी विश्वनीयता का बने रहना बेहद ज़रूरी है.स्थानीय विधायक सुरेन्द्र सिंह जाड़ावत ने कहा
कि आज मीडिया नेताओं और औधोगिक घरानों तक को नहीं छोड़ता,समय आने पर उन्हें भी सचाई की राह दिखाता है.आन्दोलन हो,आपातकाल हो या कि फिर आतंकवाद जैसे हालात,पत्रकार हमेशा अपनी राह पर अडीग नज़र आता है.उसकी सचाई ही उसकी असली ताकत है उसके बगैर जनता भी उसका साथ छोड़ने में देर नहीं करती.

बालयोगी उमेशनाथ जी महाराज के अनुसार देश का ये दुर्भाग्य ही है कि हमने चिंतन-मनन छोड़ दिया है.समय ऐसा गया है कि मीडिया का साथी अपनी कलम से कुछ लिखकर रात घर चल देता है मगर उसके लिखे पर अगली सुबह लाखों की संख्या पाठक में चिंतन-मनन-पठन करते हैं.इसलिए कलम का लिखा बहुत सधा हुआ और सोहा-समझा होना चाहिए.अब पत्रकारों को खुद ही निर्णय करना है कि उन्हें किस तरफ खडा होना है-कौरव,कंस और रावण की सेना में या कि फिर पांडवों की तरफ.मगर चिंता ये भी है कि आज देश में संत की वाणी और पत्रकार की कलम सबकुछ बिक जाता  है,जो सबसे ज़रूरी हथियार हो सकते थे

आदित्य सीमेंट के अधिकारी जगन्नाथ प्रसाद ने कहा कि हमें ये बात नहीं बुलानी चाहिए कि पत्रकार भी कई बार द्वंद्व की स्थिति में खड़ा होता है.ऐसे में उसका निर्णय बहुत मायने रखते हुए के लोगों को प्रभावित करता है.हम ये बात भी स्वीकारते हैं कि देश में जवाहर लाला नेहरू विश्वविद्यालय या कॉफ़ी हाउस में बौद्धिक चिंतन के के दौर चलते हैं,मगर अंत ठीक हमेशा की तरह ही होता है.

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


माणिक,
वर्तमान में राजस्थान सरकार के पंचायतीराज विभाग में अध्यापक हैं.'अपनी माटी' वेबपत्रिका सम्पादक है,साथ ही आकाशवाणी चित्तौड़ के ऍफ़.एम्.  'मीरा' चैनल के लिए पिछले पांच सालों से बतौर नैमित्तिक उदघोषक प्रसारित हो रहे हैं.

उनकी कवितायेँ आदि उनके ब्लॉग 'माणिकनामा' पर पढी जा सकती है.वे चित्तौड़ के युवा संस्कृतिकर्मी  के रूप में दस सालों से स्पिक मैके नामक सांकृतिक आन्दोलन की राजस्थान इकाई में प्रमुख दायित्व पर हैं.
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